आर्टिफ़िशियल इंटेलीजेंस (AI) असल दुनिया में कैसे काम करती है

कंप्यूटर उतना ही समझदार और विकसित होता है, जितना उसे सिखाने वाले लोग.

Robert Ito

बीती तीन गर्मियों में लगभग दो दर्जन भावी कंप्यूटर वैज्ञानिक स्टैनफ़र्ड विश्वविद्यालय आए ताकि आर्टिफ़िशियल इंटेलीजेंस (AI) यानी कृत्रिम समझदारी के बारे में, इस क्षेत्र में काम कर रहे कुछ सबसे काबिल लोगों से सीख सकें. सैकड़ों आवेदकों में से चुने गए इन लोगों ने दिन में आस-पास की तकनीकी कंपनियों की सैर की, बात करने वाले सोशल रोबोट और हेक्साकॉप्टर के साथ समय बिताया, सीखा कि समय को समझदारी से इस्तेमाल करना इतना अहम क्यों है, साथ ही जाना कि शब्दों के एक से ज़्यादा मायने होने पर मशीनें क्या करती हैं (जिसे तकनीकी भाषा में कंप्यूटेशनल भाषाविज्ञान कहते हैं). बीच में समय मिला तो फ़्रिस्बी जैसे खेल भी खेले. लेकिन अगर आप सोच रहे हैं कि AI का मतलब है कि कुछ लोग बैठकर वीडियो गेम बना रहे हैं, तो ऐसा नहीं है. स्टैनफ़र्ड आर्टिफ़िशियल इंटेलीजेंस लैबोरेटरी आउटरीच समर (SAILORS) कार्यक्रम में हिस्सा लेने वाली सारी लड़कियां हैं, जो अभी-अभी दसवीं में पहुंची हैं. उनकी पढ़ाई का मकसद ज़िंदगी को बेहतर बनाने के तरीके खोजना है, न कि अपने गेम को और मज़ेदार बनाना, मसलन: जम्बो जेट्स एक-दूसरे से न टकराएं, इसके लिए AI का इस्तेमाल कैसे करें? या कैसे तय करें कि डॉक्टर अॉपरेशन के कमरे में जाने से पहले हाथ धोएं? स्टैनफ़र्ड की AI लैब की निदेशक और SAILORS कार्यक्रम की एक संस्थापक फ़ी-फ़ी ली ने बताया कि “हमारा मकसद AI की पढ़ाई को ऐसा बनाना है, जिससे विविधता और सभी पृष्ठभूमि के छात्रों को बढ़ावा मिल सके. तकनीक के क्षेत्र में अगर आपके पास समाज के हर हिस्से से आने वाले छात्र हैं, तो वे वाकई इस बात का ध्यान रखेंगे कि तकनीक का इस्तेमाल सभी वर्ग के लोगों की भलाई के लिए हो.”

“तकनीक के क्षेत्र में अगर आपके पास समाज के हर हिस्से से आने वाले छात्र हैं, तो वे वाकई इस बात का ध्यान रखेंगे कि तकनीक का इस्तेमाल सभी वर्गों की भलाई के लिए हो.”

Fei-Fei Li Google & Stanford

Fei-Fei Li

SAILORS को 2015 में ली और पुरानी छात्रा ओल्गा रूसाकोस्की (जो अब प्रिंसटन विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफ़ेसर हैं) ने मिलकर बनाया. इसका मकसद तकनीकी क्षेत्र में महिलाओं और पुरुषों की बराबर की हिस्सेदारी को बढ़ावा देना है. इसकी वजह नेक है और इसकी तुरंत ज़रूरत है. हाल में हुए एक सर्वेक्षण के मुताबिक, कंप्यूटर विज्ञान में डिग्री लेने वाली महिलाओं की संख्या में कमी आई है. AI के क्षेत्र में महज़ 20 फ़ीसदी कार्यकारी पदों पर महिलाएं काम करती हैं. इस क्षेत्र में महिलाओं की गैरमौजूदगी एक बड़ी चिंता का विषय है, क्योंकि कई नए लोग रोज़ AI से जुड़ रहे हैं और इसका इस्तेमाल अपनी ज़िंदगी को आसान और बेहतर बनाने के लिए कर रहे हैं. यह AI ही है जिसके ज़रिए फ़ोटो ऐप किसी फ़ोटो में, कई लोगों के बीच भी आपके चेहरे को पहचान लेता है, इतना ही नहीं वह उस जगह को भी पहचान लेता है जहां आपने फ़ोटो खींची थी. यह AI ही है जिसके ज़रिए आपका डिवाइस आपके 'कल मौसम कैसा रहेगा' पूछने पर आपकी बात समझ जाता है. इसके अलावा कुछ कम मशहूर इस्तेमाल भी हैं, जैसे डायबिटीज़ के चलते रेटिना को होने वाले नुकसान की पहचान करना (जिसकी वजह से अक्सर आंखों की रोशनी चली जाती है) या दुनिया के सबसे दूर दराज के इलाकों में फंसे हुए लोगों के बचाव के लिए ड्रोन भेजना.

जिस रफ़्तार से AI हर जगह पैठ बना रही है, इस क्षेत्र में लैंगिक संतुलन की ज़रूरत बहुत बड़ी हो गई है और ऐसा सिर्फ़ इसलिए नहीं कि ये एक वाजिब लड़ाई है, बल्कि इसका मकसद मशीन लर्निंग और AI में सबकी हिस्सेदारी सुनिश्चित करना है. AI का लक्ष्य मशीनों को ऐसे काम करने के लिए तैयार करना है जिन्हें इंसान स्वाभाविक तौर पर आराम से कर लेते हैं, जैसे भाषा की पहचान करना, फ़ैसले लेना, मैक्सिको के खाने बुरितो और एंचेलाडा में अंतर समझना. ऐसा करने के लिए, मशीनों में बहुत बड़ी मात्रा में जानकारी डाली जाती है—अक्सर लाखों शब्द या बातचीत या तस्वीरें—ठीक उसी तरह, जैसे हम सभी जानकारी लेते हैं, जन्म से लेकर, जागकर बिताए जाने वाले हर पल में हम जानकारी जमा करते रहते हैं (संक्षेप में कहें तो यही मशीन लर्निंग है). मशीन जितनी ज़्यादा कारों को देखती है, उतने ही बेहतर तरीके से वह उनकी पहचान कर पाती है. लेकिन अगर यह डेटा सीमित या पक्षपात से भरा होगा (जैसे मान लीजिए रिसर्चर ने 50 के दशक में चलने वाली जर्मन कार ट्रैबेंट Trabant की फ़ोटो को शामिल नहीं किया) या अगर AI से जुड़े लोग इन सीमाओं या पक्षपातों को नहीं पकड़ सके (हो सकता है उन्हें उस समय के पूर्वी जर्मनी में बनने वाली इस कार के बारे में पता ही न हो), तो मशीन और उसके दिए जाने वाले नतीजे पूरी तरह सही नहीं होंगे. ऐसा हो भी रहा है. एक बार फ़ोटो की पहचान करने वाले एक सॉफ़्टवेयर ने एशियाई लोगों की तस्वीरों को देखकर बताया कि सभी लोगों ने आंखें बंद की हुई हैं.

“अब यह केवल सारी जानकारी हासिल करने की कवायद भर नहीं है. अब ज़रूरत है कि गिनती को सही दिशा में आगे बढ़ाया जाए.”

Tracy Chou Project Include

Tracy Chou

हम ऐसी काम करने की जगहें और लैब कैसे बनाएं, जहां हर तरह के लोगों को शामिल किया जा सके? बहुत से प्रोजेक्ट और लोग इस चुनौती पर काम कर रहे हैं. इस साल ली—जो Google क्लाउड में मशीन लर्निंग और AI की मुख्य वैज्ञानिक भी हैं—और बाकी लोगों ने मिलकर AI4ALL नाम की गैर-लाभकारी संस्था बनाई. अमेरिका में काम करने वाली इस संस्था का मकसद AI में ज़्यादा विविधता लाना है. जिसके लिए उन्होंने जीनोमिक्स, रोबोटिक्स के जानकारों और टिकाऊ विकास के तरीके ढूंढने वालों को बतौर मार्गदर्शक अपने साथ जोड़ा है. यह संस्था मोटे तौर पर SAILORS के काम को आगे बढ़ा रही है, लेकिन स्टैनफ़र्ड के अलावा, प्रिंसटन, यूसी बर्कली और कार्नेगी मेलन विश्वविद्यालयों से हाथ मिलाकर, अमेरिका के अश्वेत लोगों और कम आय वाले छात्रों के लिए भी काम कर रही है. ली कहती हैं “हमारे साथ काम करने वाले बहुत से लोगों और उद्योग की बड़ी हस्तियों ने हमें बताया कि, ‘SAILORS बढ़िया है, लेकिन है तो ये स्टैनफ़र्ड ही, जिससे हर साल मदद पाने वाले कुछ दर्जन छात्रों में से ज़्यादातर सैन फ़्रैंसिस्को के बे एरिया के होते हैं. इसलिए AI4ALL सभी पृष्ठभूमि के लोगों को साथ लेकर चलने की एक कोशिश है. यह संस्था सिर्फ़ लैंगिक समानता की लड़ाई नहीं लड़ रही है.”

ऐसी ही अन्य पहलों में शामिल हैं Code Next, जो ओकलैंड से काम करने वाली Google की ऐसी कंप्यूटर लैब है, जिसका मकसद लैटिन-अमेरिकी और अफ़्रीकी-अमेरिकी छात्रों को तकनीक के क्षेत्र में करियर बनाने के लिए बढ़ावा देना है, DIY Girls, लॉस एंजेलिस के पिछड़े और ज़रूरतमंद समुदायों को पढ़ाने और रास्ता दिखाने के लिए बनाया गया एक कार्यक्रम है, जो STEAM यानी science (विज्ञान), technology (तकनीक), engineering (इंजीनियरिंग), art (कला) और math (गणित) की शिक्षा देता है; इसके अलावा Project Include भी है, जिसमें छोटे और मध्यम आकार के स्टार्टअप की मदद की जाती है, ताकि वह महिलाओं और हर रंग के लोगों को ज़्यादा नौकरी दे सकें. पहले Pinterest में काम कर चुकी ट्रेसी चाउ ने, पिछले साल, तकनीक के क्षेत्र की सात नामी महिलाओं के साथ मिलकर Project Include की शुरुआत की. 2013 में ट्रेसी ने तकनीकी कंपनियों से यह जानकारी देने के लिए कहा कि उनके यहां कितनी महिलाएं काम करती हैं. आंकड़े सामने आने पर उस बात की पुष्टि हो गई, जिसके बारे में सिलिकॉन वैली के लोग पहले से जानते थे — तकनीक के क्षेत्र में, सबसे बड़ी कंपनी से लेकर, सबसे छोटे स्टार्टअप तक, हर कंपनी में ज़्यादातर कर्मचारी गोरे और पुरुष हैं. ट्रेसी कहती हैं कि इसके बाद तो Project Include को शुरू करना एक ज़रूरत बन गई. “इन आंकड़ों के सामने आने, और कोई बड़ा बदलाव न होने के कुछ साल बाद बातचीत का रुख बदलने लगा. अब यह केवल सारी जानकारी हासिल करने की कवायद भर नहीं है. हमें ज़मीनी तौर पर तय करना होगा कि कर्मचारियों की गिनती सही दिशा में आगे बढ़े."

इसमें AI के क्षेत्र में हो रहे काम को ज़्यादा से ज़्यादा आम लोगों तक पहुंचाना भी शामिल है. AI में अभी बहुत कम लोग काम करते हैं जो पहले ही, लोगों की परवाह करने वाले रोबोट और हमारी ज़रूरतों का अंदाज़ा लगाने वाले मशीनी सहायक बना चुके हैं. जब इंसान डेटा और काम की शर्तें नियंत्रित करे और मशीनें सारा काम करें, तो जितना बड़ा और बेहतर इनपुट इंसानों की तरफ़ से आएगा, उतने ही बड़े और बेहतर नतीजे मशीनें दे सकेंगी.

कई मायनों में, आम लोग पहले से ही AI का इस्तेमाल कर रहे हैं, जैसे जापान में एक किसान के बेटे ने AI की मदद से खीरों के रंग, रूप, आकार, प्रकार से जुड़े कई तरह के फ़िल्टर लगाकर, अपने परिवार के लिए खीरों की छंटाई करना आसान बनाया. यह ऐसी कहानी है जो ली जैसे लोगों को हौसला देती है. ली 16 साल की उम्र में चीन से अमेरिका आईं. तब उन्हें अमेरिका के बारे में बहुत कम जानकारी थी और न्यू जर्सी, जहां उन्हें रहना था, उसके बारे में तो वह कुछ भी नहीं जानती थीं. घरों की सफ़ाई, कुत्तों को घुमाने से लेकर, एक चीनी रेस्टोरेंट में बतौर कैशियर काम करने के बाद, ली प्रिंसटन विश्वविद्यालय पहुंच गईं और उसके बाद उन्होंने कालटेक के ग्रेजुएट स्कूल से पढ़ाई की.

तकनीक के क्षेत्र में ली तीन तरीकों से बाहरी हैं: एक, वह प्रवासी हैं, दो, महिला हैं और तीन, गोरे पुरुषों के वर्चस्व वाली दुनिया में, उनका रंग बाकी लोगों से अलग है. जो चीज़ें किसी और के लिए रुकावट बन सकती हैं, वही ली के लिए आगे बढ़ने की वजह बन गईं. वह अपना ज़्यादातर समय कंप्यूटर विज़न पढ़ने में बिताती हैं, यह मशीन लर्निंग का एक हिस्सा है जिसे वह “AI का सबसे ज़बरदस्त ऐप” कहती हैं. कंप्यूटर विज़न विज़ुअल डेटा को पहचान कर उसका विश्लेषण करता है. आने वाले समय में इसका इस्तेमाल बेहतर रोबोटिक अंग बनाने और गणित की सबसे जटिल समस्याओं को बताने या सुलझाने में किया जा सकता है. लेकिन जैसा कि हर AI के साथ है, इस तकनीक की बुनियादी ज़रूरत, मशीनों को अलग-अलग स्रोतों और नज़रियों से मिलने वाली जानकारी का विश्लेषण करना सिखाना है. या यूं कहें कि दुनिया के विज़ुअल नागरिक बनाना है—जो थोड़े ली जैसे हों.

जिस तरह की दुनिया हम बनाना चाहते हैं, उससे जुड़ी कहानियों और तकनीकी समस्याओं को सामने लाने के लिए, समाज के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले रचनाकारों को बढ़ावा देना ज़रूरी है. यही वह चुनौतियां हैं जिनसे ILMxLAB में कॉन्टेंट की रणनीति बनाने वाली डायना विलियम्स रोज़ जूझती हैं. ILMxLAB, Lucasfilm का एक टॉप-सीक्रेट (गोपनीय) ड्रीम सेंटर है जहां रचनाकार इमर्सिव यानी असली जैसा महसूस होने वाला, इंटरएक्टिव यानी तकनीक के ज़रिए बात करने वाला, मनोरंजन बनाते हैं, जैसे हो सकता है कि कोई रचनाकार कुछ ऐसा बनाएं जिसमें स्टार वॉर्स के डार्थ वेडर के साथ VR (आभासी वास्तविकता) में दो-दो हाथ करने का मौका मिल जाए. विलियम्स Black Girls Code जैसे तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने वाले संगठनों से जुड़ी हैं. उन्हें याद है कि 1980 में उनके कॉलेज में रंग वाली महिलाएं कितनी कम थीं. वह बताती हैं, “मैं हमेशा अपनी गणित की क्लास में अकेली लड़की रही, और बिज़नेस की क्लास में भी. कुछ समय बाद आप ऐसी हालत देखते-देखते थक जाते हैं, साथ ही डर भी लगता है.” उनकी राय में ज़्यादा महिलाओं को तकनीक के क्षेत्र में लाना हो तो “उन्हें बचपन से ही सिखाना शुरू करें और उनका खुद में भरोसा बढ़ाएं, ताकि जब वे कमरे में दाखिल हों और खुद को अकेला पाएं, तो घबराकर लौट ना जाएं.”

“उन्हें बचपन से ही सिखाना शुरू करें और उनका खुद में भरोसा बढ़ाएं, ताकि जब वे कमरे में दाखिल हों और खुद को अकेला पाएं, तो घबराकर लौट ना जाएं.”

Diana Williams Lucasfilm

Diana Williams

Google में मशीन लर्निंग पर रिसर्च (शोध) करने वाली माया गुप्ता, AI में एक अलग तरह का सुधार लाने की कोशिश कर रही हैं. स्टैनफ़र्ड में उन्होंने नॉर्वे की एक कंपनी की मदद की जिससे वह पानी के अंदर बनी गैस पाइपलाइन की दरारों का पता लगा सके. माया बताती हैं, “वहां पहुंचना मुश्किल था इसलिए हमें अनुमान लगाने के लिए थोड़ी जानकारी से ही काम चलाना पड़ा”. मशीनों को बारीक अंदाज़ा लगाने की शिक्षा देना माया गुप्ता के लिए आम बात है. अगर आप YouTube पर सैक्सोफ़ोन बजाने वाले कमासी वॉशिंगटन की रचना “ट्रूथ” को सुन रहे हैं, और ऐप, बिना आपके कुछ करे, एक होशियार डीजे की तरह, उसके बाद आपको एलिस कोल्ट्रेन के शानदार “तुरिया और रामकृष्ण” वीडियो पर ले जाए, तो आपको माया गुप्ता का शुक्रिया अदा करना चाहिए, क्योंकि यह उनकी टीम है, जो कंप्यूटरों को बेहतर सुझाव देना सिखाती है. “यह बस सही अनुमान लगाने की ही तो बात है, है ना?” वह कहती हैं. “जो भी सीमित जानकारी आपके पास मौजूद है, उसके ज़रिए आप अंदाज़ा लगाने की कोशिश करते हैं कि क्या चल रहा है.”

आज वह Google में एक शोध और विकास टीम का नेतृत्व कर रही हैं, जिसके बहुत से कामों में से एक काम मशीन लर्निंग को ज़्यादा सटीक बनाना भी है. माया कहती हैं “मान लीजिए मैं बोस्टन के लहजे और टेक्सस के लहजे की एकदम सही पहचान करना चाहती हूं, लेकिन मेरे पास बोली पहचानने वाली जो तकनीक है, वो टेक्सस के लहजे से ज़्यादा परिचित है. तो क्या मुझे गैरतरफ़दार बनने के लिए टेक्सस के लहजे को पहचानना बंद कर देना चाहिए, जिससे उसके नतीजे भी बोस्टन के लहजे जैसे आएं? साथ ही ऐसा भी तो हो सकता है कि बोस्टन के लहजे को पहचानना वाकई बहुत मुश्किल हो?”

माया गुप्ता और उनकी टीम कंप्यूटरों को बेहतर बनाने पर भी काम कर रही हैं जिससे कंप्यूटर, उन्हें बनाने वाले इंसानों से, ज़्यादा पारदर्शी हों. उम्मीद है कि मशीनों की मदद से हम समाज में फैले भेदभाव या गहरी पैठ बना चुकी दुर्भावनाओं को खत्म कर सकेंगे—या कम से कम उन्हें ज़्यादा आसानी से पहचान सकेंगे. मशीनों को गुस्सा नहीं आता, भूख नहीं लगती, साथ ही थक जाएं तो भी उनका ध्यान नहीं बंटता. एक स्टडी (अध्ययन) में सामने आया कि अदालत में लंच (दोपहर का खाना) से पहले पेरोल मिलने की संभावना कम होती है क्योंकि जज साइडबार के बजाय खाने के बारे में सोच रहे होते हैं. माया का कहना है कि, “इंसानों के दिमाग में क्या चल रहा है, यह पता लगाना तो टेढ़ी खीर है. लेकिन हम अपनी मशीन लर्निंग को ऐसा बनाना चाहते हैं कि सबको समझ आए. सच बात तो ये है कि उसमें शामिल बहुत सी चीज़ों को समझना, अभी भी, इंसानों को समझने से कहीं ज़्यादा आसान है.”

“हम अपनी मशीन लर्निंग को ऐसा बनाना चाहते हैं कि वह सबको समझ आए. सच बात तो ये है कि उसमें शामिल बहुत सी चीज़ों को समझना, अभी भी, इंसानों को समझने से कहीं ज़्यादा आसान है.”

Maya Gupta Google

Maya Gupta

अब जब AI का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है—और यह उपयोग में आसान भी है—तो अगला कदम इसे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचाना है. क्रिस्टीन रॉबसन, जो Google में आने से पहले IBM में रिसर्च (शोध) करती थीं, TensorFlow जैसे ओपन सोर्स सॉफ़्टवेयर की बड़ी समर्थक हैं. यह एक मशीन लर्निंग सिस्टम है, जिसका इस्तेमाल भाषा का अनुवाद करने या बीमारियों का पता लगाने से लेकर असली कला बनाने जैसे कई कामों के लिए किया जा सकता है.

रॉबसन के लिए AI में सबको शामिल करने का मतलब इसके टूल्स को आम लोगों तक पहुंचाना है, जिससे AI उनके जैसे कुछ गणित के दीवानों तक ही न सिमट कर रह जाए. वह कहती हैं, “मैं बहुत उत्साहित हूं कि मशीन लर्निंग सारी दुनिया के लिए उपलब्ध होगी. हम मशीन लर्निंग को आम लोगों तक पहुंचाने के बारे में बातें तो बहुत करते हैं, मगर मैं वाकई ऐसा करने में यकीन रखती हूं. इन टूल्स को इस्तेमाल में आसान बनाना और इन तकनीकों का उपयोग सभी के लिए संभव बनाना बेहद ज़रूरी है.

साई-फ़ाई लिट्रेचर यानी काल्पनिक-वैज्ञानिक साहित्य और फ़िल्में लंबे समय से दिखाते आ रहे हैं कि AI अगर रास्ता भटक जाए तो नतीजे कैसे होते हैं (अगले साल मैरी शेली के 'फ़्रैंकेन्सटीन' उपन्यास के 200 साल पूरे हो रहे हैं). आज ली, रॉबसन और चाउ समेत AI के क्षेत्र में काम करने वाले कई लोगों को इस बात की चिंता कम है कि AI हमारे लिए क्या कर सकती है, और इस बात की फ़िक्र ज़्यादा है कि हम AI के साथ क्या कर सकते हैं. मिसाल के तौर पर: प्रोग्रामर, वर्चुअल सहायकों के लिए महिलाओं की आवाज़ इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि पुरुष और महिलाएं दोनों इसे पसंद करते हैं. चाउ कहती हैं, “इससे इस सोच को बल मिलता है कि सहायक महिलाएं ही होती हैं. जब हम सिस्टम में यह सब डालते हैं तो वह भी ऐसे सामाजिक भेदभावों को बढ़ावा देने का ज़रिया बन जाता है.” AI क्षेत्र के दिग्गजों की चिंता है कि AI सिस्टम में कैसा डेटा डाला जा रहा है—और उसका क्या नतीजा निकलेगा. इसी वजह से AI में सबको शामिल करना बेहद अहम है. ऐसा करना आसान नहीं है. लेकिन इस पर काम कर रहे लोग समझदार हैं, उनके पास संसाधन हैं, और वह इस समस्या को दूर करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

“इन AI टूल को इस्तेमाल में बहुत आसान बनाना और इन तकनीकों का उपयोग सभी के लिए संभव बनाना बहुत ही ज़रूरी है.”

Christine Robson Google

Christine Robson

माया गुप्ता कहती हैं कि हमें सभी को यह एहसास दिलाना होगा कि कोई भी इससे जुड़ सकता है. वह राइस विश्वविद्यालय में अपनी पढ़ाई के दौरान देखी गई उस दीवार का ज़िक्र करती हैं, जिस पर उनके कॉलेज के रिटायर्ड इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के प्रोफ़ेसरों की तस्वीरें लगी थीं. उन तस्वीरों में माया को “अपने जैसा कोई चेहरा” नहीं दिखा. माया की इसी बात को आगे बढ़ाते हुए रॉबसन कहती हैं कि हमें लड़कियों को समझाना होगा कि AI कोई जादू नहीं है, “यह गणित है".

SAILORS में छात्र नैचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग यानी भाषा और बोली का एक साथ विश्लेषण करने वाली तकनीक का इस्तेमाल, आपदा के समय सोशल मीडिया के ज़रिए लोगों को खोजने और उन तक मदद पहुंचाने का तरीका सीखने के लिए कर रहे हैं. ली बताती हैं, “इससे बचाव करने वाले आपदा के समय फंसे हुए लोगों को, उनके ट्विटर संदेशों के ज़रिए, जल्दी ढूंढ सकेंगे.” ऐसे कैंप और प्रोजेक्ट का असर लंबे समय तक नज़र आता है. कुछ बच्चों ने अपने स्कूलों में रोबोटिक क्लब शुरू किए, विज्ञान की पत्रिकाओं के लिए लेख लिखे, और मिडिल स्कूलों में लड़कियों को AI के बारे में बताने के लिए वर्कशॉप की. इन छात्रों की पृष्ठभूमि और तजुर्बे उतने ही अलग हैं, जितने अलग प्रोजेक्ट पर उन्होंने कैंप में काम किया, इसलिए AI उनके लिए कोई नया 'कूल गैजेट' नहीं बल्कि अच्छे काम करने का एक ज़रिया है. 2015 में SAILORS के पहले सम्मेलन में, कार्यक्रम ने कैंप में हिस्सा लेने वाले लोगों के संदेश शेयर किए जिनमें ये भी शामिल था: “आशा है यहां से मेरा AI का सफ़र शुरू हो, जिससे आगे चलकर मैं दुनिया में कोई बदलाव ला सकूं.”

अौर देखें:

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